Colon P.

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मैं बैठा हूँ (आज भी)…

रवि आया तारों के ऊपर ,
आकाश निहारे बैठा हूँ ।
मैं नवल कोपलों के ऊपर ,
नव ख्वाब सजाये बैठा हूँ । ।

कल रात की पीड़ा से उठकर ,
नव इंतज़ार में बैठा हूँ ।
बिखरे सपनों की फिर से अब ,
मैं नाव बनाए बैठा हूँ । ।

कुटिल मनोहर ख्वाईस की ,
मैं आस लगाए बैठा हूँ ।
खूंखार तरंगों की मन में ,
मैं लहर चलाये बैठा हूँ । ।

इस मायावी धन वैभव का ,
आकार समझ ना आता है ।
इस जीवन का अब तेरे बिन ,
अभिप्राय समझ न आता है । ।

अब बीच राह में तेरी ही ,
आवाज लगाए बैठा हूँ ।
कश्ती अब अपने जीवन की ,
मैं बीच फंसाए बैठा हूँ । ।

ऊपर नीचे सर करने पर ,
रवि बचा खुचा अब दिखता है ।
तेरे आने की आस लिए ,
मैं समा जलाए बैठा हूँ । ।

सुर्ख थके से होंठों पर ,
मैं जाम लगाए बैठा हूँ ।
सोये सोये अरमानों पर ,
मैं हवा चलाये बैठा हूँ । ।

चंदा संग तारे भी मुझपर ,
अब अट्टहास कर लेते हैं ।
यह देख मूक वन पादप भी ,
दीर्घ स्वांस भर लेते हैं । ।

रवि अस्त हुआ पर ख्वाब नही ,
मैं प्यास जगाये बैठा हूँ ।
ईश्वर के दर पर मस्तक है ,
मैं हाँथ उठाये बैठा हूँ । ।

तेरे कोमल अंगों की मैं ,
आकृति बनाए बैठा हूँ ।
तेरी योवन अभिलाषा में ,
मैं ताप बढाए बैठा हूँ । ।

हो गया ख़त्म अब इंतज़ार ,
मैं आँख जलाए बैठा हूँ ।
आ गया अंत अब तीव्र ज्वार ,
मैं शीष झुकाए बैठा हूँ । ।

मोती सम नीर नयन से अब ,
मई आज गिराए बैठा हूँ ।
मैं गर्म रेत पर बारिश की ,
उम्मीद जगाये बैठा हूँ । ।

सुनसान घोर है अंधियारा ,
मैं दीप जलाए बैठा हूँ ।
अब बस है तनहा रात संग ,
मैं खाट सजाये बैठा हूँ । ।

तेरे अधरों के चुम्बन की ,
जो आस लगाए बैठा था ।
उस ख़ास तमन्ना की अब मैं ,
आहुति जलाए बैठा हूँ । ।

मैं आस लगाए बैठा था ,
मैं प्यास जगाये बैठा था ।
अब नयन जलाए बैठा हूँ ,
अब बदन जलाए बैठा हूँ । ।

नीर नयन से बहता है ,
जो विरहा की अग्नि में अब ।
सब अंत हुआ उस ख्वाब संग ,
अब प्यास बुझाए बैठा हूँ । ।

कल रात भी ऐसे बैठा था ,
इस रात भी ऐसे बैठा हूँ ।
इस जीवन की लाचारी में ,
लाचार फंसा सा बैठा हूँ । ।

फिर नयन जलाए बैठा हूँ ,
फिर बदन जलाए बैठा हूँ ।
मैं सदियों से ही बैठा हूँ ,
अब प्यास बुझाए बैठा हूँ

— Atul Sharma

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  • 2 years ago
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